द्वितीय मठाधीश · चतुर्थ वज्र गुरु

कोंगतुल त्सेफेल रिनपोछे

कोंगतुल त्सेफेल रिनपोछे का चित्र

तुलकु त्सेफेल का जन्म 1926 में तिब्बत के कोंगपो भुछु देछेनतेन में अनेक अद्भुत लक्षणों के बीच हुआ। उनके पिता याब छोफेल और माता मायुम सांग्ये थीं। 10वें मिनड्रोलिंग त्रिराब, ग्युरने दोनद्रुप वांग्याल ने तुलकु त्सेफेल को तुलकु रांगबार रिनपोछे के पुनर्जन्म के रूप में मान्यता दी। पाँच वर्ष की आयु से तुलकु ने निचले कोंगपो में रिगज़िन ग्यालिंग गुफा मठ में तुलकु जिगमे छोयिंग नोरबु के साथ इतिहास और व्याकरण तथा पढ़ना-लिखना सीखना आरंभ किया। चौदह वर्ष की आयु से उन्होंने मिनड्रोलिंग मठ में अध्ययन किया, जहाँ उन्होंने ञिङमापा परंपरा में अपना अध्ययन पूर्ण किया।

अपना अध्ययन पूर्ण करने के बाद तुलकु त्सेफेल कोंगपो लौटे, जहाँ उनके पूर्व कर्म और प्रार्थना के फलस्वरूप उनके माता-पिता पहली बार अपने मूल गुरु, क्याब्जे दुदजोम रिनपोछे से मिले। उन्होंने अपने पुत्र को परम पावन की देखरेख में अर्पित कर दिया। चूँकि तुलकु त्सेफेल मिनड्रोलिंग के भिक्षु थे, इसलिए इस अर्पण का अनुमोदन मिनलिंग छुंग रिनपोछे द्वारा किया जाना आवश्यक था, जिन्होंने क्याब्जे दुदजोम रिनपोछे की ही भाँति इसका सहर्ष समर्थन किया। तुलकु ने बारह वर्षों तक क्याब्जे रिनपोछे की सेवा की और वे जहाँ भी जाते, उनके साथ यात्रा करते। इस प्रकार उन्होंने व्यापक अभिषेक, संचरण और उपदेश प्राप्त किए। क्याब्जे रिनपोछे की सलाह पर तुलकु ने तीन बार ङोनड्रो पूर्ण किया। अपने तीसरे ङोनड्रो के दौरान तुलकु को विभिन्न लक्षणों का अनुभव हुआ, जिसके बाद क्याब्जे रिनपोछे ने कहा कि ङोनड्रो सफल रहा और पूर्ण हो गया।

तिब्बत की बिगड़ती राजनीतिक स्थिति के कारण तुलकु त्सेफेल अपने मूल गुरु से बिछड़ गए। किंतु तिब्बत से भागकर भारत पहुँचने के बाद तुलकु का क्याब्जे दुदजोम रिनपोछे से पुनर्मिलन हुआ। एक बार फिर वे क्याब्जे रिनपोछे की सेवा कर सके। क्याब्जे रिनपोछे ने तुलकु त्सेफेल से ओडिशा जाकर वहाँ बसने के लिए कहा। उस समय से अपने देहावसान तक तुलकु डुंडुल राप्टेनलिंग मठ की सेवा के लिए ओडिशा में ही रहे। लगभग 1975 में उन्हें मठ का 5वाँ मठाधीश नियुक्त किया गया। तुलकु त्सेफेल विशेष रूप से ज्योतिष और दैवज्ञ-परामर्श में अपने ज्ञान और सटीकता के लिए जाने जाते थे। उनकी प्रार्थनाएँ और आशीर्वाद प्रभावी और कल्याणकारी माने जाते थे।

1997 में तुलकु त्सेफेल ने डुंडुल राप्टेनलिंग में पहला शेद्रा (मठीय शिक्षा कार्यक्रम) स्थापित करने के लिए परम पावन शेनफेन दावा रिनपोछे की मेज़बानी की और उनसे परामर्श किया। शेद्रा बाईस भिक्षुओं के साथ आरंभ हुआ, किंतु अंततः उनमें से अधिकांश ने मठ छोड़ दिया। तुलकु त्सेफेल के सुझाव पर लामा सोनम ताशी ने 2008 में पंद्रह नए भिक्षुओं को भर्ती किया।

लगभग उसी समय तुलकु त्सेफेल का स्वास्थ्य बिगड़ने लगा। कोंगपो क्यिदुक त्सोकपा, येफेल त्सोगपा, पेको त्सोकपा और कैंप #3 के निवासियों जैसे स्थानीय तिब्बती समुदायों के साथ-साथ डुंडुल राप्टेनलिंग तथा ओडिशा में डुंडुल राप्टेनलिंग के निकट स्थित नामखा ख्युंग ज़ोंग मठों में से एक द्वारा तेनश्युक (दीर्घायु प्रार्थनाएँ) अर्पित की गईं। तुलकु का स्वास्थ्य अच्छी तरह सुधर गया और वे तीन वर्ष और जीवित रहे। उन वर्षों में तुलकु ने मठ के लिए अपने सभी विचार और आशाएँ लामा सोनम ताशी के साथ साझा कीं, जो लंबे समय से तुलकु की सेवा कर रहे थे। अपने देहावसान से तीन महीने पहले तुलकु ने कहा कि वे अधिक समय तक “नहीं रहेंगे”। तिब्बती नववर्ष के पाँचवें दिन (5 मार्च 2010) तुलकु का देहावसान हुआ, किंतु वे पाँच दिनों तक तुकदाम (ध्यानस्थ समाधि) में रहे। उन पाँच दिनों में बहुत हल्की वर्षा होती रही — एक अत्यंत शुभ लक्षण, जिसे तिब्बती में छारपा मेतोक (वर्षा-पुष्प) कहा जाता है। तुलकु त्सेफेल के देहावसान की पहली रात से लेकर उनके दाह-संस्कार तक, क्षेत्र के निवासियों ने डाकिनियों के निरंतर मंत्रोच्चार की ध्वनियाँ सुनीं। तुलकु का दाह-संस्कार लोसार के 10वें दिन किया गया, जिसमें लामा, भिक्षु और गृहस्थ सभी उपस्थित थे। दाह-संस्कार के बाद रिंगसेल (अवशेष) एकत्र किए गए, साथ ही एक इंद्रधनुषी रंग की अस्थि भी, जिसे आज भी देखा जा सकता है। पेकोद तुलकु ग्यालसे रिनपोछे ने तुलकु त्सेफेल के शीघ्र पुनर्जन्म हेतु प्रार्थनाओं का सुझाव दिया, जिनका डुंडुल राप्टेनलिंग मठ ने निष्ठापूर्वक पालन किया और उन्हें संपन्न किया।

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